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कविता का अमृत: ऋषि वाल्मीकि से विश्व कविता दिवस तक की यात्रा
काव्य की धारा अनादि काल से मानव-मन के किनारों को स्पर्श करती आई है। इतिहास बताता है कि ऋषि वाल्मीकि का शोक जिस क्षण श्लोक में बदला, वह क्षण ही विश्व की सबसे पहली कविता के अवतरण का पल था। तब से आज तक कविता दुनिया के समस्त संवेदनशील हृदयों को अशोक करने का दायित्व निभाती आ रही है। आज का दिन उसी पावन कविता-कल्याणी के वैश्विक जयघोष का पर्व है, जिसकी पुण्य-धार मनुष्य को सदियों से आनंद की अनुभूति कराती आ रही है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि वाल्मीकि एक दिन तमसा नदी के तट पर विचरण कर रहे थे। उन्होंने देखा कि एक व्याध ने क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार दिया। दूसरा पक्षी करुण क्रंदन करने लगा। यह दृश्य देखकर ऋषि के हृदय में शोक उमड़ पड़ा और उनके मुख से अनायास ही छंदबद्ध वाणी फूट पड़ी:
"मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत् क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥"
इस प्रकार शोक से श्लोक की यात्रा प्रारंभ हुई और संस्कृत साहित्य के आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण जैसे महाकाव्य की रचना की। यह केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों का अद्भुत संगम था, जिसने भारतीय संस्कृति और काव्य परंपरा को सदियों तक प्रभावित किया।
संस्कृत से आगे बढ़ते हुए, काव्य-धारा ने प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं में अपना मार्ग बनाया। महाकवि कालिदास, भास, भवभूति जैसे कवियों ने संस्कृत काव्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। प्राकृत में हाल का 'गाथासप्तशती' और अपभ्रंश में विद्यापति, सरहपा जैसे कवियों की रचनाएँ काव्य की अविरल धारा का प्रमाण हैं।
इस काल में कविता केवल राजदरबारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जन-जन तक पहुंची। भक्ति के स्वर में डूबी कविताएँ आम आदमी के हृदय को छूने लगीं, और काव्य अभिजात्य वर्ग से निकलकर सामान्य जन का भी हिस्सा बन गया।
मध्यकाल में भारतीय काव्य परंपरा ने अपने चरम को छुआ। कबीर, सूर, तुलसी, मीरा, रसखान जैसे कवियों ने कविता को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुंचाया। भक्ति काव्य ने समाज में व्याप्त जाति-पाँति, ऊँच-नीच के भेदभाव को दूर करने का प्रयास किया।
रीतिकाल में बिहारी, केशव, मतिराम, देव जैसे कवियों ने श्रृंगार रस से ओतप्रोत कविताएँ लिखीं। इस काल में काव्यशास्त्र के नियमों का पालन करते हुए भी कवियों ने अपनी मौलिकता बनाए रखी।
भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय से हिंदी कविता में नवजागरण का दौर शुरू हुआ। 'भारत दुर्दशा', 'प्रेम माधुरी', 'वैदेही विलाप' जैसी रचनाओं के माध्यम से भारतेंदु ने देशप्रेम और समाज सुधार का संदेश दिया।
द्विवेदी युग में मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध', रामनरेश त्रिपाठी जैसे कवियों ने खड़ी बोली को काव्य का माध्यम बनाया और राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया।
छायावाद ने हिंदी कविता को नए आयाम दिए। जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा ने प्रकृति और मानव-मन के सूक्ष्म भावों को अत्यंत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया।
प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के माध्यम से नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, अज्ञेय, धर्मवीर भारती जैसे कवियों ने समाज की विसंगतियों और व्यक्ति के आंतरिक संघर्ष को अपनी कविताओं का विषय बनाया।
नई कविता के दौर में रघुवीर सहाय, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी जैसे कवियों ने कविता को आम आदमी के जीवन से जोड़ा और उसकी भाषा को सरल और प्रभावशाली बनाया।
जब हम वैश्विक परिदृश्य पर नज़र डालते हैं, तो पाते हैं कि हर संस्कृति, हर भाषा, हर देश में कविता किसी न किसी रूप में मौजूद रही है। होमर से लेकर शेक्सपियर, रूमी से लेकर पाब्लो नेरुदा, रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर गाबरिएला मिस्त्राल तक, कविता ने मानवता को एक सूत्र में पिरोया है।
इसी महत्व को पहचानते हुए यूनेस्को ने सन् 1999 में 21 मार्च को 'विश्व कविता दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की। यह दिवस कविता के माध्यम से भाषाई विविधता के संरक्षण, लुप्त हो रही भाषाओं के पुनरुत्थान और संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है।
आज डिजिटल युग में कविता नए-नए माध्यमों से अपना विस्तार कर रही है। सोशल मीडिया, पॉडकास्ट, शायरी और कवि सम्मेलनों के वीडियो के माध्यम से कविता ने अपना दायरा और भी व्यापक बना लिया है। यह सही है कि बाज़ार और उपभोक्तावाद के इस दौर में कविता को अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, लेकिन जब तक मानव हृदय में भावनाएँ हैं, कविता अपना अस्तित्व बनाए रखेगी।
आज विश्व कविता दिवस पर हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने जीवन में कविता को महत्व देंगे, नई पीढ़ी को काव्य से जोड़ेंगे और अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोकर रखेंगे।
ऋषि वाल्मीकि के शोक से श्लोक तक की यात्रा ने हमें सिखाया है कि कविता केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति है। आज के इस पावन अवसर पर, आप सभी काव्य-प्रेमियों को विश्व कविता दिवस की अशेष शुभकामनाएँ!
"जब तक धरती पर जीवन है,
तब तक कविता का अस्तित्व है।
हर दिल में धड़कती है कविता,
हर सांस में बसती है कविता॥"
-आचार्य प्रताप
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